दुख से कैसे बचें
क्योंकि
आप जिस
पर ध्यान
देते हैं
वहीं चीज़
सक्रिय हो
जाती है
........
क्योंकि
ध्यान ही
जीवन की
सबसे बड़ी
कुंजी है
।
दुख से कैसे बचें भगवान्
बुद्ध ने दुःख निवारण के आठ
सूत्र दिए।
1.
दृष्टि
अर्था
जैसा है,
वैसा
ही देखना अपनी धारणाओं को बीच
में लाकर नहीं देखना। आँख
निर्दोष हो जैसे दर्पण खाली
हो। यदि दर्पण पर धुल पडी हो
कोई रंग लगा हो कोई पक्ष पडा
हो तो जैसा सत्य है,
वैसा
दिखाई नहीं पड़ता। सम्यक दृष्टि
का अर्थ है सभी दृष्टियों से
मुखत निष्पक्ष।
2.
संकल्प।
इसका अर्थ है कि जो करने योग्य
है वह करना और उस पर पूरा जीवन
लगा देना। करना किसी अहंकार
के कारण न हो,
वही
संकल्प। ऐसा संकल्प जो बोध
से हो,
जीवन
की प्रौढ़ता से हो,
क्षणिक
उत्साह,
लोग
क्या कहेंगे इस भावना से न
हों। जिसमें बाहरी उत्साह
नहीं हो आतंरिक उत्साह हो।
3.
वाणी
-
जैसा
है वैसा ही करना। अपनी मिलाकर,
बदल
कर नहीं.
ऐसा
नहीं कि भीतर कुछ है और बाहर
कुछ। वाणी में ह्रदय की सही
अवस्था प्रकट हो। जो बोलना
है,
वही
बोले,
असार
न बोले जितनी आवश्यकता हो
जिसके बिना का चले। अधिक बोलने
से बड़ी दिक्कते होती है,
जीवन
व्यर्थ के जाल में फंस जाता
है।
4.
कर्मात
अर्थात वही करना जो ह्रदय करने
को कहे। ऐसा नहीं कि कोई खे
वैसा कर दें। करें वही जो स्वयं
को करने योग्य लगे। व्यर्थ
काम नहीं,
वही
काम जिससे जीवन का सार मिले।
व्यस्त रहना,
कुछ
न कुछ करते रहना जरूरी नहीं
है। करना वही जो जरूरी हो,
उसी
को बुद्ध सम्यक कर्म कहते हैं।
5.
आजीव।
आजीव का अर्थ आजीविका से है।
रोटी तो कमानी ही है पर आजीविका
सम्यक हो,
विध्वंसात्मक
न होकर सृजनात्मक हो और जीवन
को परमात्मा की तरफ ले जाने
वाली हो। बुद्ध कहते है कि
अपने जीने के लिए किसी का जीवन
नष्ट करना अनुचित है। आजीविका
ऐसी हो जिससे किसी का अहित न
होता हो। यदि कोई दूसरे का
अहित करता है तो वह अपने ही
अहित के बीज बोता है।
6.
व्यायाम।
यहाँ व्यायाम का अर्थ श्रम
से समयक श्रम न तो आलस्य और न
ही अति कर्मठता है जहाँ दौड
रुके ही नहीं। दोनों का मध्य
मार्ग है समयक व्यायाम,
जहाँ
जीवन की ऊर्जा संतुलित हो।
7.
समाधि
अर्थात मन बंद हो जाए और होश
भी बना रहे। असली बात जाग्रत
रह कर आनंद को उपलब्ध होना,
उसीक
ओ बुद्ध ने सम्यक समाधि कहा
है। अंतिम दो चरण सर्वाधिक
महत्व है।
8.
स्मृति
परिधि पर और सम्यक समाधि केंद्र
पर। परिधि पर होश हो और फिर
केंद्र में भी होश की ज्योति
जले तो ही सम्यक समाधि।
दुख से कैसे बचें
गौतम
बुद्ध
ने
चार
आर्य
सत्य
का
उपदेश
दिया
-
भगवन
बुद्ध ने संसार को जीवन के चार
आर्य सत्य दिए हैं। भगवान्
की यह देशना सर्वकालिक है।
वे ढाई हजार वर्ष पूर हुए पर
उनके बताये हुए मार्ग उस समय
भी सटीक थे,
आज
भी हैं और जब तक मनुष्य है तब
तक रहेंगे। उन्होंने मनुष्य
के स्वभाव और चेतना की बात की
है-
श्रद्धा
पर नहीं पर विज्ञान पर आधारित
कर। उन्होंने एक जीवन विज्ञान
दिया,
दर्शन
शास्त्र की बात ही नहीं की
मात्र रोग व मोचिकित्सा की
बात की है। किसी और पर आश्रित
होने को नहीं कहा परन्तु स्वयं
के जागरण व होश को महत्व दिया।
इशारे दिए और मार्ग स्वयं
ढूँढने को कहा। उनका सारा जोर
इस बात पर था की मनुष्य की पीड़ा
कैसे दूर हो,
उसमें
कैसे रूपांतर आए और वह स्वयं
ही आनंद रूपी स्वभाव की पहचान
कर सके।
1) दुःख
: इस
दुनिया में
सब कुछ
दुःख है
। जन्म
में, बूढे
होने में,
बीमारी
में, मौत
में, प्रियतम
से दूर
होने में,
नापसंद
चीज़ों के
साथ में,
चाहत
को न
पाने में,
सब
में दुःख
है ।
2) दुःख
प्रारंभ
तृष्णा, या
चाहत, दुःख
का कारण
है और
फ़िर से
सशरीर करके
संसार को
जारी रखती
है ।
3) दुःख
निरोध
: तृष्णा
से मुक्ति
पाई जा
सकती है
।
4) दुःख
निरोध
का मार्ग
: तृष्णा
से मुक्ति
आर्य अष्टांग
मार्ग के
अनुसार जीने
से पाई
जा सकती
है ।
दुख से कैसे बचें जीवन
अवलोकन
1. हम
जीवन के
दुःख और
सुख का
सही अवलोकन
करें। अपने
जीवन के बारे मे समझे।
2. जीवन
में संकल्पों
का बहुत
महत्व है।
यदि दुःख
से छुटकारा
पाना हो
तो दृढ़
निश्चय कर
लें कि
जीवन के मार्ग
पर चलना
है।
3. जीवन
में वाणी
की पवित्रता
और सत्यता
होना आवश्यक
है। यदि
वाणी की
पवित्रता
और सत्यता
नहीं है
तो दुःख
निर्मित होने
में ज्यादा
समय नहीं
लगता।
4. कर्म
चक्र से
छूटने के
लिए आचरण
की शुद्धि
होना जरूरी
है। आचरण
की शुद्धि
क्रोध, द्वेष
और दुराचार
आदि को त्यागने
से होती
है।
5. यदि
आपने दूसरों
का हक
मारकर या
अन्य किसी
अन्यायपूर्ण
उपाय से
जीवन के
साधन जुटाए
हैं तो
इसका परिणाम
भी भुगतना
होगा इसीलिए
न्यायपूर्ण
जीविकोपार्जन
आवश्यक है।
6. ऐसा
प्रयत्न करें
जिससे शुभ
की उत्पत्ति
और अशुभ
का निरोध
हो। जीवन
में शुभ
के लिए
निरंतर प्रयास
करते रहना
चाहिए।
7. चित्त
में एकाग्रता
का भाव
आता है
शारीरिक तथा
मानसिक
भोग-विलास
की वस्तुओं
से स्वयं
को दूर
रखने से।
एकाग्रता
से विचार
और भावनाएँ
स्थिर होकर
शुद्ध बनी
रहती हैं।
8. उपरोक्त
सात मार्ग
के अभ्यास
से चित्त
की एकाग्रता
द्वारा
निर्विकल्प
प्रज्ञा की
अनुभूति होती
है। यह
समाधि ही
धर्म के
समुद्र में
लगाई गई
छलांग है।
दुख से कैसे बचें दुःख निवारण की अवस्था
जब
इस बात का अहसास हो गया कि जब
जीवन है तो दुख अवश्यम्मभावी
है,
फ़िर
कारण पर विचार किया और उन कारणों
को दूर करने के लिये आष्टांगिक
मार्ग का अनुसरण कर सातवें-आठवें
सूत्र तक पहुंचे तो निदान हो
गया,
उपाय
हो गया कारण मिट गये,
तब
चौथा आर्य सत्य सुख की अवस्था
आ गई। इसे निर्वाण की अवस्था
महासुख की अवस्था कुछ भी कहा
जा सकता है।




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